Hari Om, ShreeMangalChandika Prapatti is on Thrusday, 15 Jan 2015.

सारांश

सन्‌ २०११ से मकरसंक्रांति के दिन सभी श्रद्धावान वीराएँ बापूजी द्वारा किए गए मार्गदर्शनानुसार सामूहिक श्रीमंगलचण्डिकाप्रपत्ती बड़े ही उत्साह एवं खुशी से मनाती हैं। श्रद्धावान वीराओं के साथ अन्य महिलाएँ भी इस प्रपत्ती में शामिल होती हैं। यह प्रपत्ती मैं देश के लिए, परिवार के लिए कर रही हूँ, इस बात का संतोष मकरसंक्रांति के दिन प्रपत्ती करनेवाली प्रत्येक श्रद्धावान महिला के चेहरे पर दिखाई देता है। हर वर्ष इस सामूहिक प्रपत्ती के समारोह में शामिल होनेवाली महिलाओं की संख्या बढती ही जा रही है।

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प्रपत्ती की विधि

एक चौरंग या पीढ़े पर बड़ी परात रखना। परात में गेहूँ फैलाकर उस पर कलसी या कलश रखना। उसमें चावल भरना, कलशी के ऊपर ताम्हण (तांबे की छोटी थाली) रखना और ताम्हण में देवी के दो पग बनाना। दाहिना पग कुमकुम का और बायाँ पग हलदी का होना चाहिए। उस परात में कलश से टेक लगा कर स्वयंभगवान त्रिविक्रम की तस्वीर रखें। यह हो गई पूजा की रचना।

महिलाएं पूजन के लिए थाली और पूजन द्रव्य लाएं। पूजनद्रव्य में सहजन, केला, ककड़ी या लौकी, श्रीफल अर्थात नारियल, गाजर, मूली या कुंदरू, उड़द की दाल, तिल का तेल, दही, हलदी पाउड़र (साबुत हलदी नहीं), अद्रक, गुड़, इमली, गन्ने के टुकड़े, सुगंधित फूल और अभिचारनाशक पुडिया होती है। पान, नमक, सरसों और कपूर रखकर उस पान को धागे से बाँधकर उसकी पुड़िया बनाएं, यही अभिचारनाशक पुडिया है।
 
इन पूजन द्रव्यों से भरी थाली हाथों में लिए महिलाएं प्रपत्ती करने के स्थल पर खड़ी रहती हैं। उनमें से उम्र में बड़ी महिला ‘माते गायत्री, सिंहारुढ भगवती - महिषासुरमर्दिनी, क्षमस्व चण्डिके जय दुर्गे अखिल विश्व की जननी माँ उदे उदे उदे उदे उदे’, यह माता महिषासुरमर्दिनी की आरती उतारेगी और उसके साथ साथ अन्य महिलाएं यह आरती दोहराएंगी।

तदुपरांत थाली हाथ में लिए प्रत्येक महिला चण्डिका के पद्चिन्ह स्थान अर्थात कतराज आश्रम के इर्दगिर्द नौं परिक्रमाएं करेंगी। परिक्रमा करते हुए बडी आवाज में श्रीगुरुक्षेत्रम्‌ मंत्र पढना है। परिक्रमाएं पूर्ण होने पर अभिचारनाशक पुडिया से त्रिविक्रमजी की नजर उतारनी है। नजर उतारते समय त्रिविक्रम से प्रार्थना करनी है कि, “बाबा रे! मेरे घर पर जो कोई कुदृष्टि, कुबुद्धि हो तुम अपनी माँ की सहायता से उन सभी का नाश करना।’’ और फिर वह पुडिया होमकुंड या किसी गढ्‌ढ़े में समिधाएं और कपूर की सहायता से प्रज्वलित की गई अग्नि में अर्पण करनी है। यह निर्माण किया गया अग्नि माता महिषासुरमर्दिनी का तेजोवलयम्‌ है। इस कृति द्वारा अपने घर की सारी जिम्मेदारी त्रिविक्रमजी पर सौंपी जाती है। श्रीगुरुक्षेत्रम्‌ मंत्र के कारण अग्नि का रूपांतर तेजोवलयम्‌ में हो जाता है। घर पर जो कुदृष्टि, कुबुद्धि, कुकर्म होते हैं वे तेजोवलयम्‌ में ड़ाले जाने के कारण घर का कल्याण होता है, ऐसा श्रद्धावानों का विश्वास है।

पूजन के बाद ‘ॐ ऐं र्‍हीं, क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ यह मंत्र नौं बार जपते हुए सभी महिलाओं को माता के कदमों पर अक्षता अर्पण करनी हैं और त्रिविक्रम को सुगंधित फूल अर्पण करने हैं, और तेजोवलयम्‌ की अग्नि को नीम के पत्तों से शांत करना है। तत्पश्चात महिलाएं उन पगों के हलदी-कुमकुम घर न ले जाएं बल्कि, वहीं पर अपने माथे या गले पर लगाएं और फिर प्रसाद के रूप में अर्पण किया गया केला वहीं ग्रहण करें तथा दही घर के पुरुषों को दें। यदि घर में पुरुष न हों तो वह किसी भी वृक्षतले अर्पण कर दें। गन्ना घर ले जाकर महिलाएं खुद थोड़ा-थोड़ा रोज खाएं। थाली में शेष पूजन द्रव्यों का सांसबर बनाकर घर के स्त्री-पुरुष व अन्य लोग भात और रोटी के साथ खाएं। स्वाद के लिए मसाला और आरोग्य के लिए कड़ीपत्ते का प्रयोग अवश्य करें। मात्र उस दिन अन्य कोई भी सब्जी न बनाएँ। पूजन के बाद महिलां ‘जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी’ इस गजर पर चक्राकार घूमकर इस प्रपत्ती का भरपूर आनंद उठा सकती हैं।

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प्रपत्ति करने की पद्धति


संक्रांति के दिन सूर्यास्त के बाद खुली जगह में सभी महिलाएं को एकसाथ मिलकर यह प्रपत्ती करनी होती है। यह प्रपत्ती करने से प्रत्येक महिला को उसके परिवार की रक्षक सैनिक अर्थात ‘बॉडीगार्ड’ बनने के लिए आत्मिक बल प्राप्त होता है। चाहे वह महिला माँ, पत्नी, बहन किसी भी भूमिका में हो, प्रपत्ती करने के कारण वह रक्षक बनती है। संभवत: यह प्रपत्ती खुली जगह में अर्थात समुद्र या नदीकिनारे, मैदान में, गैलरी में, चॉल के कटघरे के पास करनी चाहिए। इस प्रपत्ती के लिए जितनी अधिक महिलाएं इकठ्ठा होंगी उतना ही अच्छा होता है। सोलह वर्ष की आयु से अधिक की कोई भी महिला यह प्रपत्ती कर सकती है। एक वर्ष प्रपत्ती करने के बाद हर वर्ष करनी अनिवार्य नहीं है। महिलाओं का मासिक धर्म भी इस प्रपत्ती के आड़े नहीं आता। मासिक धर्म के दौरान महिलाएं अपनी जुबान या नाभि पर उदी लगाकर प्रपत्ती में शामिल हो सकती हैं, ऐसा सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने कहा है।

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जानकारी

“श्रीमंगलचण्डिका प्रपत्ती’ श्रद्धावान महिलाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण पर्व है। आदिमाता चण्डिका की प्रपत्ती करनेवाली महिला अपने साथ साथ घर की, समाज की, देश की रक्षा करने के लिए समर्थ बनती है और इस प्रपत्ती द्वारा प्राप्त आत्मिक बल से समर्थ बनी महिला अपने साथ साथ घर-परिवार, समाज, देश और धर्म का विकास करने में समर्थ होती है। सद्‌गुरु श्री अनिरुद्धजी ने एक प्रवचन में महिलाओं की प्रपत्ती का महत्त्व समझाया था, उस बोध का यह सारांश है।

‘रामराज्य’ पर किए गए महत्त्वपूर्ण प्रवचन में सद्‌गुरु श्री अनिरुद्धजी ने महिलाओं की ‘श्रीमंगलचण्डिकाप्रपत्ती’ की घोषणा की। ‘श्रीमंगलचण्डिकाप्रपत्ती’ महिलाओं को पराक्रमी बनाती है। प्रपत्ती शब्द का अर्थ है आपत्तिनिवारण करनेवाली शरणागति। यह मंगलचण्डिका प्रपत्ती परमात्मा की मां आदिमाता चण्डिका के चरणों में अर्पण की जाती है। महिलाएं मकरसंक्रांति के दिन अर्थात १४ या १५ जनवरी को यह प्रपत्ती मनाती हैं, क्योंकि संक्रांति के दिन ही आदिमाता महिषासुरमर्दिनी ने महिषासुर को मारने के लिए पृथ्वी पर कर्दम ऋषि और देवहूति के कतराज आश्रम में पहला कदम रखा था।

इसीलिए संक्रांति के दिन सूर्यास्त के बाद ‘श्रीमंगलचण्डिकाप्रपत्ती’ की जाती है। सूर्यास्त के बाद क्यों? क्योंकि, महिषासुरमर्दिनी ने सूर्यास्त के बाद कतराज आश्रम में पहला कदम रखा था। सूरज के रहते यदि माता महिषासुरमर्दिनी पधारी होतीं तो उनका तेज मनुष्य सह नहीं पाते; इसलिए उन्होंने सूर्यास्त के बाद पहला कदम रखा।

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सारांश


२०११ सालापासून मकरसंक्रांतीच्या दिवशी सर्व श्रध्दावान वीरा बापूंनी केलेल्या मार्गदर्शनानुसार सामूहिक श्रीमंगलचण्डिकाप्रपत्ती अगदी जल्लोषात साजरी करत आहेत. श्रध्दावान वीरांच्या बरोबरीने इतर महिलाही या प्रपत्तीमध्ये सहभागी होतात. ही प्रपत्ती देशासाठी, कुटुंबासाठी मी करते आहे, याचे समाधान मकर संक्रांतीच्या दिवशी ही प्रपत्ती करणार्या प्रत्येक श्रद्धावान स्त्रीच्या चेहर्यावर दिसत असते. दरवर्षी या सामूहिक प्रपत्ती सोहळ्यात सहभागी होणार्या स्त्रियांची संख्या वाढतच आहे.

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प्रपत्तीची विधी


एका चौरंगावर किंवा पाटावर मोठी रा घ्यावी. परातीत गहू, त्यावर कळशी किंवा कलश घ्यावा. त्यामध्ये तांदूळ, कळशीवर ताम्हण आणि ताम्हणात देवीची दोन पावले काढावीत. उजवं पाऊल कुंकवाचं तर डावं पाऊल हळदीचं असलं पाहिजे. त्या परातीमध्ये कलशाला टेकून स्वयंभगवान त्रिविक्रमाची तसबीर ठेवावी. ही झाली पूजेची मांडणी. 

स्त्रियांनी पूजेसाठी येताना तबक आणि सोबत पूजनद्रव्ये घेऊन यावे. पूजनद्रव्यांमध्ये शेवग्याच्या शेंगा, केळी, काकडी किंवा दुधी, श्रीफळ म्हणजेच नारळ, गाजर, मुळा किंवा तोंडली, उडदाची डाळ, तिळाचं तेल, दही, हळद (हळकुंड नाही), आलं, गूळ, चिंच, उसाचे कांडे सुंगधी फुले आणि अभिचारनाशक पुरचुंडी असते. विड्याचे पान, त्यामध्ये मीठ, मोहरी आणि कापूर घालून त्या पानाला दोर्याने बांधायचे आणि ही पुरचुंडी करायची, ही झाली अभिचारनाशक पुरचुंडी.

हे पूजाद्रव्यांनी भरलेले तबक हातात घेऊन स्त्रिया प्रपत्ती करायच्या स्थळी उभ्या राहतील. त्यांच्यातील वयाने मोठी असलेली स्त्रीमाते गायत्री, सिंहारूढ भगवती-महिषासुरमर्दिनी, क्षमस्व चडिण्के, जय दुर्गे, अखिल विश् की जननी माँ उदे उदे उदे उदे उदे’, ही माता महिषासुरमर्दिनीची आरती करेल. त्यापाठोपाठ बाकीच्या स्त्रिया ही आरती म्हणतील.

त्यानंतर तबक हातात घेऊन प्रत्येक स्त्रीने चण्डिकेच्या पदचिन्हस्थानास अर्थात्कतराज आश्रमास फेर धरल्याप्रमाणे नऊ प्रदक्षिणा करायच्या. ते करत असताना श्रीगुरुक्षेत्रम् मंत्र मोठ्याने म्हणायचा. प्रदक्षिणा पूर्ण झाल्यावर अभिचारनाशक पुरचुंडीने त्रिविक्रमाची दृष्ट काढायची. ‘बाबा रे! माझ्या घरावर असणारी कुठलीही कुदृष्टी, कुबुद्धी या सगळ्यांचा तू तुझ्या आईच्या सहाय्याने नाश कर!’, अशी प्रार्थना करून मग ती पुरचुंडी परातीत, होमकुंडात किंवा खड्ड्यामध्ये कापूर आणि समिधांच्या सहाय्याने जो अग्नी निर्माण केला असेल, त्यामध्ये अर्पण करायची. हा निर्माण केलेला अग्नी म्हणजे महिषासुरमर्दिनीचे तेजोवलयम्. या कृतीने घराची सर्व जबाबदारी त्रिविक्रमावर सोपवली जाते. श्रीगुरुक्षेत्रम् मंत्रामुळे अग्नीचं रूपांतरण तेजोवलयम्मध्ये होतं. घरावर असलेली कुदृष्टी, कुबुद्धी, कुकर्म ह्या तेजोवलयम्मध्ये गेल्यामुळे घराचं कल्याण होतं असा श्रद्धावानांचा विश्वास आहे.

पूजन झाल्यावर ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चेहा मंत्र नऊ वेळा म्हणत सर्व स्त्रियांनी या पावलांवर अक्षता वाहाव्यात त्रिविक्रमास सुगंधी फुले अर्पण करावीत. तसेच तेजोवलयम्च्या अग्नीस कडुलिंबाच्या पाल्याने शांत करावे. नंतर जमलेल्या सर्व स्त्रियांनी त्या पावलांतील हळद-कुंकू घरी नेता स्वतःच्या कपाळाला किंवा गळ्याला लावावे. प्रसाद म्हणून दिले गेलेले केळे तिथल्या तिथेच ग्रहण करावे, तर दही घरातल्या पुरुषांना द्यावे. पुरुषमंडळी नसतील तर कुठल्याही वृक्षाच्या मुळाशी ते अर्पण करावे. ऊस स्त्रियांनी घरी नेऊन स्वतः रोज थोडा थोडा खावा. तबकातल्या उरलेल्या पूजाद्रव्यांचे सांबार बनवून घरातल्या स्त्रिया अणि पुरुषांनी पोळी आणि भाताबरोबर खावे. चवीसाठी मसाला आणि आरोग्यासाठी कडीपत्ता जरूर घालावा. मात्र त्यादिवशी इतर कुठलीही भाजी करू नये. पूजन झाल्यावर स्त्रियाजयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनीया गजरावर फेर धरून या प्रपत्तीचा मनसोक्त आनंद लुटू शकतात.

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प्रपत्ती करण्याची पध्दत



संक्रातीच्या दिवशी सूर्यास्तानंतर मोकळ्या जागी स्त्रियांनी एकत्र येऊन ही प्रपत्ती करायची असते. ही प्रपत्ती केल्यामुळे प्रत्येक स्त्रीला तिच्या कुटुंबाची रक्षणकर्ती सैनिक अर्थात् ​‘बॉडीगार्डबनण्यासाठीचे आत्मिक बल प्राप्त होते, मग ती स्त्री आई, पत्नी, बहीण कोणत्याही भूमिकेत असो. प्रपत्ती केल्याने ती रक्षणकर्ती बनते. शक्यतो ही प्रपत्ती मोकळ्या जागी म्हणजेच समुद्र किंवा नदीकिनारी, मैदानात, बाल्कनीमध्ये, चाळीच्या कठड्याजवळ करायची. या प्रपत्तीसाठी जेवढ्या जास्त स्त्रिया एकत्र येतील तितके चांगले. सोळा वर्षांवरील कुठलीही स्त्री ही प्रपत्ती करू शकते. पहिल्या वर्षी प्रपत्ती केल्यावर दरवर्षी ती करणे बंधनकारक नाही. तसेच या प्रपत्तीच्या आड स्त्रियांचा मासिकधर्म येत नाही. मासिक पाळी आल्यास स्त्रिया जिभेला किंवा नाभीला उदी लावून या प्रपत्तीमध्ये सामील होऊ शकतात, असे सद्गुरु श्री अनिरुद्धांनी सांगितले आहे.

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